Umar Guzregi Imtihaan Mein Kya – Jaun Elia
उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या
दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या
मेरी हर बात बे-असर ही रही
नुक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या
मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं
यही होता है ख़ानदान में क्या
अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं
हम ग़रीबों की आन-बान में क्या
ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से
आ गया था मिरे गुमान में क्या
शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद
नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या
ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़
तू नहाती है अब भी बान में क्या
बोलते क्यूँ नहीं मिरे हक़ में
आबले पड़ गए ज़बान में क्या
ख़ामुशी कह रही है कान में क्या
आ रहा है मिरे गुमान में क्या
दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत
ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या
वो मिले तो ये पूछना है मुझे
अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या
यूँ जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या
है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद
ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या
ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता
एक ही शख़्स था जहान में क्या
- Jaun Elia
यहाँ जौन एलिया की बेहद मक़बूल और रूह को झकझोर देने वाली ग़ज़ल “उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या” पर आधारित है। इस ग़ज़ल का आख़री शेर (“ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता…”) इंटरनेट और शायरी की दुनिया में एक कल्ट स्टेटस रखता है।
“उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या”
“नमस्कार और स्वागत है आपका… आपके अपने पॉडकास्ट पर। सिलीगुड़ी की इस ख़ामोश शाम से, मैं हूँ आपका दोस्त aur host Manoj Agarwal, ‘सिलीगुड़वी’।
दोस्तों,
ज़िंदगी में कभी न कभी एक ऐसा दौर ज़रूर आता है, जब इंसान पूरी दुनिया के बीच घिरा होने के बावजूद ख़ुद को बिल्कुल अकेला पाता है।
एक ऐसा वक़्त… जहाँ अपनी ही बातें बेअसर लगने लगती हैं और दिल बार-बार एक ही सवाल पूछता है कि, क्या पूरी उम्र बस इसी कशमकश में गुज़र जाएगी? उर्दू अदब के सबसे बागी, सबसे तन्हा और सबसे हसीन शायर… जौन एलिया साहब।
जौन सिर्फ़ लिखते नहीं थे, वो अपनी तन्हाई और अपने ज़ख़्मों को काग़ज़ पर जीते थे। आज की ग़ज़ल उनके उसी अकेलेपन, बेबसी और ज़ात के फलसफे का एक आईना है, जिसका एक-एक शेर आपके दिल में उतर जाएगा।
तो तसल्ली से बैठिए, हेडफ़ोन लगा लीजिए और महसूस कीजिए जौन साहब की इस मखमली उदासी को…”
“जौन साहब के इन लफ़्ज़ों की तासीर को और गहराई
से समझने के लिए, इसके कुछ चुनिंदा शब्दों के मायने जानना बेहद ज़रूरी है:
- नुक़्स (Nuqs): इसका मतलब होता है कमी, ख़ामी या दोष।
- जौन यहाँ ख़ुद से ही सवाल कर रहे हैं कि क्या उनके कहने के अंदाज़ में ही कोई कमी है कि उनकी बात किसी पर असर नहीं करती।
- आबले (Aable): यानी छाले (Blisters)। जब दुनिया उनके हक़ में ख़ामोश रहती है, तो वो तंज़ कसते हुए पूछते हैं कि क्या सबके तलवों की तरह ज़बान पर भी छाले पड़ गए हैं जो कोई सच नहीं बोल पा रहा।
- दुकान-ए-दीद (Dukaan-e-Deed): दीद का मतलब होता है देखना या नज़ारा। दुकान-ए-दीद बंद होने का अर्थ है आँखों का बंद हो जाना, या किसी का रास्ता देखना बंद कर देना।
- शफ़क़ (Shafaq): सूरज डूबने के बाद आसमान में जो सुर्खी या लालिमा छा जाती है, उसे शफ़क़ कहते हैं।”
“जौन एलिया की शायरी की यही ख़ूबसूरती है। वो जब पूछते हैं न कि ‘एक ही शख़्स था जहान में क्या’, तो वो जानते हैं कि जहान में लोग तो बहुत हैं… पर उस एक शख़्स के बिना ये पूरा जहान भी खाली ही लगता है।
कैसी लगी आपको हमारी आज की यह पेशकश और जौन साहब की ये रूहानी ग़ज़ल? कमेंट बॉक्स में अपनी पसंदीदा लाइन ज़रूर लिखिएगा।
अगर सिलीगुड़ी की इस महफ़िल ने आपके दिल को छुआ हो, तो चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करना मत भूलिएगा। अपना ख़याल रखिए, शब्बा ख़ैर, अलविदा।”